Tuesday, 14 January 2014

कभी कभी मेरे दिल में (4)

कभी कभी मेरे दिल में, खयाल आता है
के मैं बन जाऊँ वह हुस्न
जिसे कुदरत ने अपने हाथोंसे तराशा हो..
देकर इस दिल को,
फुलों की नज़ाकत
पत्थरों की बेरूख़ी
दर्याओं की गहराई
और
साहिलों की तनहाई... !

ताक़ी मैं जी सकूँ हर जज़्बात को इत्मिनान से,
उसके सही हिसाब से...

समझ सकूँ,
यह सब कुदरत का किया कराया है,
दुनिया में संजोग नही होते...

कभी कभी मेरे, दिल में...

-बागेश्री

1 comment:

  1. 'वह हुस्न जिसे कुदरतने अपने हाथोंसे तराशा हो..'
    'दुनियामे संजोग नही होते….'
    mesmerizing !
    Stands apart from the rest in the series until now.
    Wishful thinking decked up in soulful words.
    So intense that it melts into the reader's mind &
    takes up the shape of his own thoughts..
    Superb.

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