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कभी कभी मेरे दिल में, खयाल आता है
के तू बन ज़ाए वोह बंदिश, जिसे मैने गाना चाहा,
मैं पिरोंदू हर वोह सांस लफ्जोंमें, जो मैंने आख़री पलों के लिएँ बचाकर रखी थी..   
कुछ इस तरह सूरों में समा ज़ाऊ
के पता ना चले जो बिखरी पडी जमीं पर वोह सरगम थी या सांसे...

कभी कभी मेरे दिल में...

- बागेश्री